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आदरणीय मुख्य अतिथि महोदय, सम्माननीय प्रधानाचार्य जी, विद्वान शिक्षकगण, और मेरे प्यारे युवा साथियों!
आज जब हम सब यहाँ एकत्रित हुए हैं, तो मैं आपसे एक बहुत ही साधारण सा सवाल पूछना चाहता हूँ। क्या आपने कभी सोचा है कि आसमान का रंग नीला क्यों होता है? या समुद्र का पानी हमें नीला क्यों दिखाई देता है? शायद आप में से बहुत से लोग कहेंगे कि यह तो एक आम बात है, पानी आसमान के नीले रंग को परावर्तित (reflect) करता है, इसलिए वह नीला दिखता है। आज से लगभग सौ साल पहले, दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक भी यही मानते थे। लेकिन क्या यह सच था? जी नहीं! और इस ‘नहीं’ के पीछे एक ऐसा रोमांचक रहस्य छिपा है, जिसने आगे चलकर भारत का नाम विज्ञान के वैश्विक पटल पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कर दिया।
आज 28 फरवरी के इस ऐतिहासिक दिन पर, मैं आपके सामने जो rashtriya vigyan diwas bhashan प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं है, बल्कि यह उस जिद, जुनून और जिज्ञासा की कहानी है जिसने एक गुलाम भारत में भी विज्ञान की एक स्वतंत्र ज्योति जलाई थी। आज के इस डिजिटल युग में जब कई छात्र एक बेहतरीन national science day speech in hindi की तलाश करते हैं, तो उन्हें केवल तथ्य नहीं, बल्कि उस भावना को समझना चाहिए जो आज के दिन के पीछे छिपी है।
समुद्र के नीले रंग का वह ऐतिहासिक रहस्य
कहानी शुरू होती है साल 1921 की गर्मियों से। एक युवा भारतीय वैज्ञानिक ‘एस.एस. नर्कुंडा’ (S.S. Narkunda) नाम के पानी के जहाज से यूरोप से अपनी यात्रा पूरी करके भारत लौट रहा था। भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) से गुजरते हुए उस युवा वैज्ञानिक की नजरें समुद्र के गहरे नीले पानी पर टिक गईं। उस समय के महान ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉर्ड रेले (Lord Rayleigh) का यह सिद्धांत पूरी दुनिया में माना जाता था कि समुद्र का नीला रंग केवल आसमान का अक्स (reflection) है।
लेकिन उस युवा भारतीय का तार्किक और जिज्ञासु दिमाग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था। उसने जहाज पर ही अपने पास मौजूद एक छोटे से उपकरण ‘प्रिज्म’ (Prism) को निकाला और आसमान की तरफ करके देखा। उसने आसमान के अक्स को ब्लॉक कर दिया, लेकिन इसके बावजूद समुद्र का पानी नीला ही दिखाई दे रहा था। उस एक पल ने दुनिया के सामने यह साबित कर दिया कि लॉर्ड रेले का सिद्धांत गलत था। समुद्र का नीला रंग आसमान का उधार लिया हुआ रंग नहीं है, बल्कि पानी के अणुओं (molecules) और प्रकाश (light) के टकराने का अपना एक अलग विज्ञान है।
वह युवा और प्रतिभाशाली वैज्ञानिक कोई और नहीं, बल्कि हमारे देश के गौरव, सर चन्द्रशेखर वेंकटरमन (Sir C.V. Raman) थे। भारत लौटने के बाद, सी.वी. रमन ने कलकत्ता (अब कोलकाता) की एक छोटी सी प्रयोगशाला में दिन-रात एक कर दिया। उनके पास कोई बहुत बड़ी और अत्याधुनिक लैबोरेटरी नहीं थी। मात्र 200 रुपये के साधारण उपकरणों की मदद से, उन्होंने प्रकाश के प्रकीर्णन (Scattering of Light) पर अपना शोध शुरू किया।
28 फरवरी 1928: ‘रमन प्रभाव’ (Raman Effect) का जन्म
पूरे सात साल की कड़ी मेहनत के बाद, अंततः 28 फरवरी 1928 का वह ऐतिहासिक दिन आया, जब सर सी.वी. रमन ने पूरी दुनिया के सामने एक ऐसी खोज रखी जिसने भौतिक विज्ञान (Physics) में तहलका मचा दिया। उन्होंने साबित किया कि जब प्रकाश की किरण किसी पारदर्शी (transparent) माध्यम (जैसे पानी या कांच) से होकर गुजरती है, तो प्रकाश के कुछ कणों का स्वभाव और उनकी तरंगदैर्ध्य (wavelength) बदल जाती है। इसी जादुई और युगांतरकारी खोज को पूरी दुनिया ने सम्मान के साथ ‘रमन प्रभाव’ (Raman Effect) का नाम दिया।
यह कोई छोटी-मोटी खोज नहीं थी। इस खोज ने रसायन विज्ञान और भौतिकी की दुनिया में क्रांति ला दी। आज हम एयरपोर्ट पर जो लगेज स्कैनर देखते हैं, या बीमारियों का पता लगाने के लिए जो लेजर तकनीक और स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल होता है, वह सब ‘रमन प्रभाव’ की ही देन है। उनकी इसी अद्वितीय उपलब्धि के लिए साल 1930 में उन्हें भौतिकी (Physics) का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। विज्ञान के क्षेत्र में यह सर्वोच्च सम्मान पाने वाले वे न केवल पहले भारतीय थे, बल्कि पहले एशियाई व्यक्ति भी थे।
इसी महान दिन को अमर बनाने के लिए, साल 1986 में भारत सरकार के ‘नेशनल काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी कम्युनिकेशन’ (NCSTC) ने 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वीकार कर लिया गया। और तब से लेकर आज तक, हम हर साल 28 फरवरी को यह पर्व मनाते आ रहे हैं।
विज्ञान: हमारी रगों में दौड़ता एक विचार
साथियों, मेरा यह rashtriya vigyan diwas speech देने का उद्देश्य केवल आपको इतिहास के पन्ने पलटना नहीं है, बल्कि आपको यह याद दिलाना है कि विज्ञान हमारे जीवन का आधार है। विज्ञान क्या है? क्या यह केवल स्कूलों की मोटी-मोटी किताबों में छपे कठिन फॉर्मूले हैं? क्या यह केवल प्रयोगशाला (Laboratory) में रखे रसायनों और टेस्ट-ट्यूब का नाम है? नहीं! विज्ञान तो हमारे सोचने का एक तरीका है, यह जीवन जीने की एक कला है।
सुबह उठने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अलार्म से लेकर, रात को सोने से पहले जिस स्मार्टफोन पर हम दुनिया भर की खबरें पढ़ते हैं, वहां हर जगह विज्ञान मौजूद है। आज विज्ञान ने भौगोलिक दूरियों को समेट कर रख दिया है। हम मीलों दूर बैठे अपने प्रियजनों से पलक झपकते ही वीडियो कॉल पर बात कर सकते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने हमें वह ताकत दी है कि हम बड़ी से बड़ी महामारियों का वैक्सीन कुछ ही महीनों में तैयार कर लेते हैं।
लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि भारत के लिए विज्ञान कोई पश्चिम से आई हुई नई चीज नहीं है। जब दुनिया की कई सभ्यताएं अभी ज्ञान का ककहरा ही सीख रही थीं, तब हमारे महर्षि सुश्रुत दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी और मोतियाबिंद का ऑपरेशन कर रहे थे। जब दुनिया को ब्रह्मांड और ग्रहों की परिक्रमा की सही समझ नहीं थी, तब आर्यभट्ट ने शून्य (Zero) का आविष्कार कर गणित और खगोल विज्ञान (Astronomy) की नींव रख दी थी। हमारी तो रगों में ही उसी प्राचीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण का खून दौड़ रहा है।
आधुनिक भारत: अंतरिक्ष से लेकर एआई (AI) तक की उड़ान
आज का भारत केवल अपने प्राचीन ज्ञान या 1928 की पुरानी उपलब्धियों का गुणगान करने वाला भारत नहीं है। आज का भारत 21वीं सदी की महाशक्तियों की आँखों में आँखें डालकर बात करने वाला भारत है। आज हमारा ‘इसरो’ (ISRO) अंतरिक्ष के क्षेत्र में नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता, जिसने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर उतारने वाला दुनिया का पहला देश बना दिया, हमारी वैज्ञानिक क्षमता का सबसे बड़ा और जीता-जागता प्रमाण है। इसके तुरंत बाद ‘आदित्य एल-1’ (Aditya L-1) का सूर्य के रहस्यों को जानने के लिए अंतरिक्ष में स्थापित होना, यह साबित करता है कि अब आसमान भी हमारी हदों को नहीं बांध सकता।
आज हम केवल तकनीक के उपभोक्ता (consumer) नहीं रहे, बल्कि हम इसके निर्माता (creator) बन रहे हैं। स्वदेशी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नेशनल क्वांटम मिशन (NQM) और ग्रीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।
2026 की थीम: “Women in Science: Catalysing Viksit Bharat”
मेरे प्यारे साथियों, जब हम विज्ञान की प्रगति की बात करते हैं, तो एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। आप सभी जानते हैं कि हर साल राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के लिए एक विशेष थीम चुनी जाती है। इस वर्ष 2026 के लिए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जो थीम तय की गई है, वह बहुत ही सशक्त और प्रेरणादायक है— “Women in Science: Catalysing Viksit Bharat” (विज्ञान में महिलाएं: विकसित भारत को उत्प्रेरित करना)।[1][2][3][4]
यह थीम इस बात का प्रतीक है कि 2047 तक भारत को एक ‘विकसित राष्ट्र’ (Viksit Bharat) बनाने का जो सपना हमने देखा है, वह हमारी आधी आबादी यानी मातृशक्ति के बिना कभी पूरा नहीं हो सकता।[1][4] एक समय था जब यह माना जाता था कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीक (STEM) केवल पुरुषों का क्षेत्र है। लेकिन आज हमारी महिला वैज्ञानिकों ने इस मिथक को पूरी तरह से तोड़ दिया है।
इतिहास गवाह है कि मैडम मैरी क्यूरी जैसी महिलाओं ने विज्ञान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और दो अलग-अलग क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार जीता। यदि हम अपने भारत की बात करें, तो ‘मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर डॉ. टेसी थॉमस का अग्नि-V मिसाइल प्रोजेक्ट में योगदान कौन भूल सकता है? अंतरिक्ष परी कल्पना चावला ने साबित किया कि लड़कियों के लिए आसमान की कोई सीमा नहीं है। चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 मिशन का नेतृत्व करने वाली रितु करिधाल और मुथैया वनिता जैसी महान महिला वैज्ञानिकों ने दुनिया को बता दिया है कि विज्ञान का कोई जेंडर नहीं होता। विज्ञान सिर्फ प्रतिभा, मेहनत, लगन और तार्किक सोच मांगता है।[1][4]
आज इस national science day bhashan के माध्यम से मैं देश की हर बेटी, हर छात्रा से यह अपील करना चाहता हूँ कि आप आगे आएं। विज्ञान के क्षेत्र (STEM) में अपना करियर बनाएं। देश को आज नई महिला इनोवेटर्स (Innovators) की जरूरत है जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी, क्लाइमेट चेंज और सस्टेनेबल डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में दुनिया को नई दिशा दिखा सकें।[1]
वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) और अंधविश्वास से मुक्ति
महान वैज्ञानिक और हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी ने कहा था— “विज्ञान मानवता के लिए एक खूबसूरत उपहार है, हमें इसे बिगाड़ना नहीं चाहिए।”
विज्ञान का असली मतलब केवल भौतिकी या रसायन विज्ञान के नियम रटना नहीं है, बल्कि अपने भीतर एक ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ (Scientific Temper) विकसित करना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सीधा सा अर्थ है— हर चीज पर सवाल उठाना, चीजों को ज्यों का त्यों स्वीकार न करना और तर्क (Logic) के आधार पर फैसले लेना।
दुर्भाग्य से, आज भी हमारे समाज में कई तरह के अंधविश्वास फैले हुए हैं। बिल्ली का रास्ता काटना, नींबू-मिर्च टांगना, या ग्रहण के समय बाहर न निकलना— ये सब ऐसी चीजें हैं जिनका विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। प्राचीन काल में जब सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण होता था, तो लोग डर जाते थे कि किसी राक्षस ने सूर्य को निगल लिया है। लेकिन विज्ञान ने हमें बताया कि यह कोई राक्षस नहीं, बल्कि पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा की एक खगोलीय घटना और उनकी परछाई का खेल है।
आज जब हमारे हाथ में 5G इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत है, तब भी अगर हम वॉट्सऐप (WhatsApp) पर आने वाली किसी भी झूठी खबर या अंधविश्वास को बिना सोचे-समझे आगे बढ़ा (Forward) देते हैं, तो यह हमारी वैज्ञानिक हार है। एक छात्र के रूप में, हमारा यह सबसे बड़ा कर्तव्य है कि हम अफवाहों और विज्ञान के बीच के अंतर को समझें।
युवाओं और छात्रों के लिए संदेश
आज यहां बैठे हर एक विद्यार्थी से मैं यह कहना चाहता हूँ कि आप अपने भीतर छिपे उस ‘सी.वी. रमन’ को कभी मरने न दें। बचपन में हम सभी के अंदर एक वैज्ञानिक होता है। हम हर चीज को लेकर सवाल पूछते हैं कि “यह खिलौना कैसे चलता है?”, “तारे क्यों टिमटिमाते हैं?”, “हवा क्यों चलती है?” लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम सवाल पूछना बंद कर देते हैं और चीजों को रटना शुरू कर देते हैं।
विज्ञान रटने का विषय नहीं है, यह समझने और प्रयोग करने का विषय है। न्यूटन ने सेब को पेड़ से गिरते हुए देखकर उसे खाया नहीं, बल्कि यह सवाल पूछा कि “यह सेब नीचे ही क्यों गिरा, ऊपर क्यों नहीं गया?” और इसी एक सवाल ने ‘गुरुत्वाकर्षण’ (Gravity) के महान नियम को जन्म दिया। आपके द्वारा पूछा गया एक छोटा सा “क्यों” (Why) और “कैसे” (How) कल के एक बड़े आविष्कार की नींव रख सकता है।
आज दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, नई बीमारियां और ऊर्जा संकट जैसी कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। इन चुनौतियों का समाधान न तो कोई जादू कर सकता है और न ही कोई चमत्कार। इनका समाधान केवल और केवल विज्ञान के पास है। कल की स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy), कल की जीवन रक्षक दवाइयां और कल की उन्नत तकनीक आप ही के बीच से निकले हुए युवा वैज्ञानिक तैयार करेंगे।
मंच से अपनी बात को समाप्त करने से पहले, मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि सर सी.वी. रमन का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता के लिए बहुत बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। यदि आपके पास एक दृढ़ संकल्प, अटूट जिज्ञासा और अपने लक्ष्य के प्रति पूरी लगन है, तो आप एक छोटे से प्रिज्म (Prism) से भी पूरी दुनिया को रोशन कर सकते हैं।
आइए, आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के इस पावन अवसर पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाएंगे। हम भारत को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में फिर से विश्व गुरु बनाने के लिए अपना शत-प्रतिशत योगदान देंगे। हम विज्ञान का उपयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि मानव जाति के विकास और शांति के लिए करेंगे।
आप सभी ने मुझे इतने ध्यान और धैर्य से सुना, इसके लिए मैं हृदय से आपका आभारी हूँ।
धन्यवाद!
जय हिंद! जय भारत! जय विज्ञान!