मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले के पांढुर्णा तहसील में हर साल लगने वाला गोटमार मेला (Gotmar Festival) अपनी हिंसक परंपरा के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यह परंपरा जम नदी के किनारे बसे दो गाँवों – पांढुर्णा और सावरगाँव – के बीच निभाई जाती है। मेले के दिन नदी के बीचों-बीच एक पलाश का पेड़ झंडे के रूप में गाड़ा जाता है, जिसे पाने के लिए दोनों गाँवों के लोग नदी में उतरते हैं। झंडा जिस गाँव के हाथ लगता है, वह उसे अपने मंदिर ले जाकर विजय का प्रतीक मानता है और यह गाँव की प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है।
पत्थरबाज़ी की परंपरा
इस दौरान दोनों ओर से लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में “गोटमार” कहा जाता है। यह परंपरा कई सदियों से चली आ रही है, लेकिन इसके आरंभ को लेकर कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। केवल लोककथाएँ सुनाई जाती हैं—कहीं कहा जाता है कि सावरगाँव की लड़की और पांढुर्णा के लड़के की शादी के विवाद से यह शुरू हुआ, तो कहीं कहा जाता है कि एक युवक युवती को लेकर भागा और नदी पार करते समय पत्थरबाज़ी हुई। कुछ लोगों का कहना है कि एक समय ऐसा भी था जब नदी के दोनों ओर बैठी बारातों के बीच विवाद हुआ, और देखते ही देखते दोनों ओर से पत्थरबाज़ी शुरू हो गई। यही घटनाएँ धीरे-धीरे एक स्थायी परंपरा में बदल गईं।
आज भी सुभाष कावले का परिवार झंडा गाड़ने की परंपरा निभाता है, लेकिन वे स्वयं भी इस कथा को ऐतिहासिक सत्य मानने से इंकार करते हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक परंपरा है, जिसकी कोई लिखित पुष्टि नहीं है। उनका यह भी कहना है कि “यह कथानक गढ़ा गया है। जब पूछा जाता है कि यह कब शुरू हुआ, किस समय पर हुआ, तो कोई नहीं बता सकता। न समय है, न प्रमाण। बस पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परंपरा निभाई जाती रही है।” उनके अनुसार, यह परंपरा किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की है, और वह इसे अपने पूर्वजों की जिम्मेदारी समझकर निभाते हैं।
हर साल इस मेले में लगभग 40–50 हज़ार की भीड़ जुटती है, जिनमें से 5–6 हज़ार लोग सक्रिय पत्थरबाज़ी करते हैं। यह क्रम 12–13 घंटे तक चलता है। पत्थरबाज़ी का यह सिलसिला कई बार एक स्थान पर केंद्रित न होकर पूरे मैदान में फैल जाता है, जिससे सुरक्षा और चिकित्सा सेवाओं के संचालन में बहुत कठिनाई होती है। कई बार दोनों ओर से 5-6 लोगों की अलग-अलग टोलियाँ लगातार पत्थरबाज़ी करती हैं, और बीच में 6-7 गाँवों के प्रमुख व्यक्ति खड़े रहकर झंडा निकालने और स्थिति संभालने का प्रयास करते हैं।
जिला प्रशासन के अनुसार, हर साल 800 से 1000 लोग घायल होते हैं, जिनमें से कई गंभीर अवस्था में पहुँच जाते हैं और कभी-कभी मौतें भी हो जाती हैं। 1955 में इसमें एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत दर्ज हुई थी। 2011 में भी एक व्यक्ति की मौत पत्थर लगने से हो गई थी, जब उसे समय पर अस्पताल नहीं पहुँचाया जा सका। उस समय मौके पर एम्बुलेंस नहीं थी, और लोगों ने बताया कि घायल व्यक्ति की साँसें घटनास्थल पर ही थम गईं। उनके चेहरे पर गंभीर चोटें थीं और उनके परिजनों ने बताया कि उन्हें कई घंटे तक सहायता नहीं मिल सकी।
प्रशासन ने कई बार इस परंपरा को रोकने या बदलने की कोशिश की है—जैसे पत्थरों की जगह रबर की गेंदों का प्रयोग, सुरक्षा जालियों का उपयोग, भारी पुलिस बल और मेडिकल टीम की तैनाती। इसके अलावा, झंडा निकालने के समय लाउडस्पीकर से चेतावनी दी जाती है, कई बार सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन भी निगरानी के लिए लगाए जाते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद यह मेला उसी रूप में चलता है, क्योंकि स्थानीय लोगों का मानना है कि यह केवल खेल नहीं, बल्कि उनकी परंपरा, पहचान और आस्था का प्रतीक है। वे कहते हैं, “हम यह किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं करते, यह तो हमारी वर्षों से चली आ रही मान्यता है।”
यही कारण है कि प्रशासन के सभी प्रयासों के बावजूद, यह आयोजन आज भी वैसा ही होता है जैसा दशकों पहले होता था। इसमें लोगों की आँखें फूट सकती हैं, हाथ-पाँव टूट सकते हैं, और जान तक जा सकती है, फिर भी यह परंपरा बिना किसी ठोस ऐतिहासिक आधार के, केवल विश्वास और आस्था के बल पर पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है।
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