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सोने को अक्सर “सेफ” एसेट कहा जाता है—ऐसा निवेश जिसे लोग तब खरीदते हैं जब वे स्थिरता चाहते हैं। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में गोल्ड ने वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा लोग आमतौर पर उम्मीद करते हैं। तेज़ उछाल, अचानक गिरावट और फिर तेजी से रिकवरी—ये सब कुछ ऐसे हो रहा है जैसे गोल्ड कोई हाई-वोलैटिलिटी ट्रेडिंग एसेट बन गया हो। आज 7 फरवरी 2026 (शनिवार) को मार्केट अभी भी जनवरी के उस असाधारण दौर को पचा रहा है, जब सोने ने रिकॉर्ड लेवल्स छुए और फिर बहुत तेजी से करेक्शन भी दिखाया।
यह उतार-चढ़ाव “यूँ ही” नहीं है। इसके पीछे कई वजहें एक साथ काम कर रही हैं—ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें, डॉलर और करेंसी मूवमेंट, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, सेंट्रल बैंकों की खरीद, और एक नया तरह का सट्टा-आधारित ट्रेडिंग माहौल, जिसमें खासकर एशियाई बाजारों में रिटेल भागीदारी और लीवरेज (उधार लेकर ट्रेड) कीमतों को ऊपर और नीचे दोनों तरफ जरूरत से ज्यादा तेज़ धकेल सकता है।
फरवरी की शुरुआत तक ग्लोबल मार्केट में स्पॉट गोल्ड (अंतरराष्ट्रीय कीमत) जनवरी की ऐतिहासिक रैली और उसके बाद आई तेज़ गिरावट के बाद उच्च स्तरों के आसपास उतार-चढ़ाव कर रहा है। इस तरह के दौर में “आज का भाव” एक फिक्स नंबर नहीं होता—दिन में कई बार रेट बदलते हैं, खासकर जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूवमेंट तेज़ हो।
भारत में भी यही असर दिखता है। आज 7 फरवरी 2026 को भारतीय समय 16:39 बजे (IST) के आसपास 24K सोना करीब ₹15,660/ग्राम और 22K सोना करीब ₹14,355/ग्राम के आसपास रिपोर्ट किया जा रहा था (शहर, मेकिंग चार्ज/प्रीमियम और स्रोत के हिसाब से इसमें थोड़ा अंतर संभव है)। यहां रिटेल गोल्ड रेट (24K/22K) केवल ग्लोबल प्राइस से नहीं चलता, बल्कि रुपये की चाल, इम्पोर्ट कॉस्ट, स्थानीय डिमांड और ज्वेलरी मार्केट के प्रीमियम/डिस्काउंट से भी प्रभावित होता है। इसलिए अलग-अलग शहरों और अलग-अलग स्रोतों में रेट का थोड़ा अंतर दिखना सामान्य है। तेज़ बाजार में यह अंतर और फैल भी सकता है—क्योंकि दुकानदार/डीलर रिस्क मैनेजमेंट के लिए स्प्रेड बढ़ा देते हैं।
इसका मतलब साफ है: “Gold Price Today” एक single point नहीं बल्कि एक moving range है—और यही वोलैटिलिटी का पहला संकेत है।
जनवरी 2026 में गोल्ड केवल बढ़ा नहीं—बल्कि रिकॉर्ड लेवल्स की तरफ बहुत तेजी से दौड़ा। जब कोई एसेट बहुत कम समय में बहुत ज्यादा बढ़ता है, तब उसमें दो तरह के खिलाड़ी तेजी से बढ़ते हैं। पहला, लॉन्ग-टर्म निवेशक और सुरक्षित निवेश करने वाले लोग। दूसरा, शॉर्ट-टर्म ट्रेडर और मोमेंटम (ट्रेंड) पकड़ने वाले सट्टेबाज, जो तेजी देखते ही तेजी से पोज़िशन बनाते हैं।
ऐसे दौर में कीमतें कभी-कभी fundamentals (असल मांग/सप्लाई) से आगे निकल जाती हैं। क्योंकि जैसे-जैसे भाव बढ़ता है, और लोग खरीदते हैं, और भाव बढ़ता है—यह एक self-reinforcing cycle बन जाती है। लेकिन जब बाजार एक तरफ बहुत crowded हो जाता है (यानी एक ही दिशा में बहुत ज्यादा पोज़िशन), तब छोटा सा ट्रिगर भी “trap door” जैसा असर कर सकता है—जहां कीमतें अचानक गिरने लगती हैं।
फिर होता है leveraged positions का unwind: जिन लोगों ने उधार लेकर ट्रेड किया होता है, उन्हें margin calls आते हैं, वे जल्दी-जल्दी पोज़िशन काटते हैं, और गिरावट और तेज़ हो जाती है। यही कारण है कि रिकॉर्ड हाई के बाद गिरावट अक्सर धीरे नहीं आती—कई बार झटके में आती है।
सोना केवल महंगाई या शादी-ब्याह की डिमांड से नहीं चलता। गोल्ड की कीमतें अक्सर “विश्वास” (confidence) और “अनिश्चितता” (uncertainty) पर भी बहुत तेज़ प्रतिक्रिया देती हैं। खासकर जब मामला केंद्रीय बैंक की नीति, ब्याज दरें, या आर्थिक स्थिरता का हो।
जब निवेशकों को लगता है कि नीति स्थिर है और भविष्य अनुमानित है, तब “सेफ हेवन” की मांग कम हो सकती है। लेकिन जब उन्हें लगता है कि नीति में बड़ा बदलाव आ सकता है, या निर्णयों में अनिश्चितता बढ़ रही है, तब गोल्ड का आकर्षण बढ़ जाता है।
हाल के दौर में पॉलिसी नैरेटिव में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़े मूवमेंट करा रहे हैं। उदाहरण के लिए, अगर बाजार को यह लगे कि केंद्रीय बैंक का भविष्य का रुख पहले की तुलना में ज्यादा “हॉकिश” (सख्त) हो सकता है, या फिर इसका उल्टा—तो गोल्ड तुरंत रिएक्ट करता है। ऐसे नैरेटिव-शॉक्स से ही कीमतों में तेज़ ऊपर-नीचे दिखाई देता है।
सोना ऐसा एसेट है जो ब्याज नहीं देता। बॉन्ड, एफडी या सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स की तरह इसमें “इंटरेस्ट इनकम” नहीं मिलती। इसलिए जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं या ऊंची रहने की उम्मीद होती है, तब कुछ निवेशक सोने की बजाय इंटरेस्ट देने वाले एसेट्स चुनना पसंद करते हैं। वहीं जब ब्याज दरों के घटने की उम्मीद बनती है, तब गोल्ड तुलनात्मक रूप से ज्यादा आकर्षक लगता है—क्योंकि उसे होल्ड करने की opportunity cost कम हो जाती है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—“उम्मीदें” (expectations)। मार्केट अक्सर भविष्य की संभावना पर ट्रेड करता है, न कि केवल आज की वास्तविक स्थिति पर।
इसलिए किसी डेटा रिलीज, किसी नीति बयान, या किसी बड़े राजनीतिक/आर्थिक संकेत से यदि यह लगे कि भविष्य में रेट कट जल्दी हो सकता है या देर से—तो डॉलर और बॉन्ड यील्ड में मूवमेंट होता है। और चूंकि गोल्ड का डॉलर और यील्ड्स से गहरा संबंध होता है, गोल्ड तुरंत प्रभावित होता है।
यही वजह है कि कई बार “आज” कोई आधिकारिक निर्णय नहीं आता, फिर भी गोल्ड तेज़ी से हिलता है—क्योंकि ट्रेडर्स भविष्य की दिशा को फिर से प्राइस-इन कर रहे होते हैं।
इस बार गोल्ड की वोलैटिलिटी असामान्य रूप से ऊंची लगने का एक बड़ा कारण है—मार्केट में speculative participation का बढ़ना। कई जगह, खासकर एशिया के कुछ फ्यूचर्स मार्केट्स में, रिटेल ट्रेडिंग और शॉर्ट-टर्म उत्साह बहुत तेज़ हुआ है।
जब बहुत सारे ट्रेडर एक ही दिशा में भागते हैं और लीवरेज का इस्तेमाल करते हैं, तो कीमतें “स्मूद” तरीके से नहीं चलतीं। बढ़त में भी उछाल दिखता है, और गिरावट में भी झटके।
रैली के दौरान, तेजी देख कर नए खरीदार आते हैं, मार्केट मेकर्स हेजिंग करते हैं, और यह हेजिंग खुद कीमतों को और ऊपर धकेल सकती है। लेकिन जब दिशा बदलती है, तब वही लीवरेज उल्टा असर करती है—मार्जिन कॉल्स, मजबूरन बिकवाली, और कम लिक्विडिटी का “एयर पॉकेट”।
इसका नतीजा यह होता है कि सोना—जो पारंपरिक रूप से “धीमे और स्थिर” चलने वाला एसेट माना जाता है—कभी-कभी बहुत तेज़ और हाइपरएक्टिव दिखने लगता है।
जहां speculation शॉर्ट-टर्म में कीमतों को बहुत हिला सकता है, वहीं लॉन्ग-टर्म में गोल्ड को सपोर्ट देने वाली चीज़ें अलग होती हैं। इनमें सबसे बड़ी चीज़ है—सेंट्रल बैंकों की खरीद।
कई देशों के केंद्रीय बैंक अपनी रिज़र्व रणनीति में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ाकर डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। जब गोल्ड बहुत ऊपर-नीचे हो रहा होता है, तब भी अगर official buying स्थिर बनी रहती है, तो बाजार को यह संकेत मिलता है कि “नीचे से असली मांग मौजूद है।”
यह खरीदारी day-trade money नहीं होती। यह आम तौर पर रणनीतिक (strategic) होती है—लंबे समय के लिए। इसलिए जब करेक्शन आता है, तब भी यह भावना बनी रहती है कि गोल्ड के पास structural support है, जो लंबे समय की दिशा को स्थिर कर सकता है।
भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं, संस्कृति और जरूरत का भी हिस्सा है। लेकिन जब कीमतें बहुत ज्यादा और बहुत अस्थिर हो जाती हैं, तो फिजिकल खरीदार—खासकर ज्वेलरी खरीदने वाले—कुछ समय के लिए रुक जाते हैं।
ऐसे दौर में लोग अक्सर खरीद को टालते हैं, या फिर छोटे हिस्सों में खरीदते हैं ताकि एक ही रेट पर पूरा रिस्क न लेना पड़े। इसके अलावा, ज्वेलरी खरीदते समय लोग केवल “रेट” नहीं देखते—मेकिंग चार्ज, वेस्टेज, जीएसटी, और बायबैक/एक्सचेंज पॉलिसी भी महत्वपूर्ण होती है।
वोलैटिलिटी में इन सबके बीच एक और चीज़ बदलती है: प्रीमियम/डिस्काउंट। जब मांग धीमी हो जाती है, तो कई बार प्रीमियम घटता है। दूसरी तरफ, अगर सप्लाई या इम्पोर्ट साइड पर दबाव हो, तो प्रीमियम बढ़ भी सकता है। यही कारण है कि तेज़ बाजार में शहर-दर-शहर रेट में फर्क ज्यादा महसूस हो सकता है।
आज के दौर में एक दिलचस्प बदलाव यह है कि कई जगह गोल्ड की मांग का स्वरूप बदल रहा है। जहां पहले ज्वेलरी डिमांड अधिक स्थिर और धीरे चलने वाली थी, वहीं अब बार्स और कॉइन्स जैसी इन्वेस्टमेंट डिमांड कई बार ज्यादा दिख रही है।
जब उपभोक्ता सोने को “निवेश” के रूप में ज्यादा देखने लगते हैं, तब डिमांड कीमतों के ट्रेंड से अधिक जुड़ जाती है। रैली में डिमांड तेजी से बढ़ सकती है, और करेक्शन में अचानक ठंडी भी पड़ सकती है। यह बदलाव भी वोलैटिलिटी को बढ़ा सकता है।
कई लोग सोचते हैं कि रिकॉर्ड हाई बनने के बाद जब मार्केट “कूल” होगा, तो सब सामान्य हो जाएगा। लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता। बड़े मूव के बाद बाजार को संतुलन बनाने में समय लगता है।
जनवरी जैसी रैली के बाद फरवरी में तीन तरह की ताकतें एक-दूसरे से लड़ती हैं। कुछ ट्रेडर डिप खरीदना चाहते हैं, कुछ लोग मुनाफा लेकर निकलना चाहते हैं, और कई नए निवेशक स्पष्टता का इंतजार करते हैं। यह tug-of-war कीमतों को चॉपी (बार-बार ऊपर-नीचे) बना देता है।
इसके साथ, अगर गोल्ड अभी भी हेडलाइन्स पर संवेदनशील है—पॉलिसी सिग्नल, जियोपॉलिटिक्स, सेंट्रल बैंक खरीद—तो छोटे-छोटे समाचार भी बड़े मूवमेंट करा सकते हैं।
ज्यादातर परिवारों के लिए गोल्ड ट्रेडिंग नहीं, वैल्यू स्टोर है—लंबी अवधि का सुरक्षा कवच, सांस्कृतिक जरूरत, या बचत का एक रूप। लेकिन वर्तमान बाजार ऐसा है जहां इमोशनल फैसले नुकसान करा सकते हैं।
अगर आप ज्वेलरी खरीद रहे हैं, तो वोलैटिलिटी का मुख्य असर टाइमिंग और बजट पर पड़ता है। स्पाइक के समय खरीदने पर “ज्यादा रेट” का रिस्क होता है, और फिर करेक्शन में पछतावा महसूस हो सकता है। ऐसे में व्यवहारिक तरीका यह है कि उछाल देखकर जल्दबाजी न करें, जरूरत हो तो खरीद को हिस्सों में बांटें, और केवल रेट नहीं—प्योरिटी, मेकिंग चार्ज, और रिटर्न/एक्सचेंज पॉलिसी पर भी ध्यान दें।
अगर आप निवेशक हैं, तो वोलैटिलिटी रिस्क को बढ़ाती है। आप लॉन्ग टर्म में सही हो सकते हैं, फिर भी शॉर्ट टर्म में गलत एंट्री या लीवरेज के कारण नुकसान हो सकता है। इसलिए लक्ष्य के अनुसार साधन चुनना महत्वपूर्ण है: फिजिकल गोल्ड लंबी अवधि के लिए, गोल्ड ETF लिक्विडिटी और सुविधा के लिए, और फ्यूचर्स/ऑप्शंस केवल तभी जब आप जोखिम समझते हों और तेज़ उतार-चढ़ाव झेल सकें।
यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है, वित्तीय सलाह नहीं। लेकिन केंद्रीय बात सरल है: वोलैटिलिटी वाले बाजार में “प्रक्रिया” (process) भविष्यवाणी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
आने वाले दिनों में गोल्ड की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि बाजार फिर से “फंडामेंटल” ड्राइवर्स पर लौटता है या नैरेटिव-और-फ्लो आधारित ट्रेडिंग का दबाव बना रहता है।
अगर सेंट्रल बैंक खरीदारी स्थिर रहती है, तो यह लॉन्ग-टर्म सेंटिमेंट को सपोर्ट दे सकती है। अगर ब्याज दरों (और रेट कट) को लेकर स्पष्टता बढ़ती है, तो कीमतों में उतार-चढ़ाव थोड़ा कम हो सकता है—भले ही रैली धीमी हो जाए। लेकिन यदि speculative “metals fever” जारी रहता है और लीवरेज्ड ट्रेडिंग बढ़ी रहती है, तो तेज़ स्विंग्स गोल्ड का हिस्सा बने रह सकते हैं।
पाठकों के लिए निष्कर्ष यह नहीं है कि गोल्ड “खतरनाक” हो गया है। निष्कर्ष यह है कि जनवरी की रिकॉर्ड रैली के बाद बाजार एक नया संतुलन ढूंढ रहा है—असल मांग और सट्टा-जोश के बीच, हेजिंग और प्रॉफिट-बुकिंग के बीच, और ‘सेफ्टी’ और ‘स्पीड’ के बीच।